Phimosis Homeopathic Medicine

लिंगेन्द्रिय के अग्रभाग (सुपारी) को ढंकने वाली त्वचा को मुण्डावरक कहते हैं। सम्भोग के समय इसके शिशन-मुण्ड से पीछे हट जाने पर ही मैथुन क्रिया उचित ढङ्ग से सम्पन्न हो पाती है । शैशवावस्था से ही इस त्वचा की सफाई तथा इसे पीछे की ओर हटाने का उपाय करना आवश्यक है । ऐसा न करने पर यह त्वचा लिंगमुण्ड से चिपक जाती है, जिसके कारण न केवल मैथुन करना ही असम्भव होता है, अपितु भयंङ्कर कष्ट भी होता है।

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मुसलमानों में इस त्वचा को हटा देने के लिए बालक का खतना करने की प्रथा है। खतने की प्रथा स्वास्थ्य रक्षा की दृष्टि से उत्तम है, परन्तु जो लोग खतना नहीं कराते, उन्हें इस त्वचा को पीछे की ओर सरकाने तथा इसके भीतरी भाग की सफाई की ओर निरन्तर ध्यान देते रहना चाहिए। इस त्वचा के चिपके रहने से इसके भीतर पस भी पड़ सकता है और कष्ट भी होता ही है। जिन छोटे बच्चों की मुण्डावरक त्वचा पीछे की ओर न हटती हो, तो उनके लिए औषधोपचार करना उचित है, परन्तु वयस्क व्यक्तियों के साथ यदि कठिनाई हो तो उन्हें अस्त्रोपचार द्वारा ही मुण्डावरक त्वचा को हटा देना चाहिए। चिकित्सा इस रोग में निम्नलिखित औषधियों का लक्षणानुसार प्रयोग करना चाहिए।

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नवजात बच्चों में फाइमोसिस की समस्या सामान्य मानी जाती है जो समय बीतने के साथ-साथ यानी 2 से 3 सालों में, लिंग की त्वचा को ऊपर करने और अच्छे से साफ रखने के बाद यह समस्या खुद ब खुद दूर हो जाती है।

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फाइमोसिस के प्रकार: Types of Phimosis.

फिमोसिस मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं

  • फाइमोसिस : इस प्रकार के फाइमोसिस में लिंग की ऊपरी त्वचा आपस में जुड़ी होती है लेकिन उसमें दर्द की अनुभूति नहीं होती।
  • पाराफिमोसिस : पैराफाइमोसिस में लिंग की ऊपरी त्वचा जुड़ी होने के साथ-साथ उस में सूजन और दर्द की अनुभूति होती है।

किन कारणों की वजह से फाइमोसिस उत्पन्न होती है?: Causes of Phimosis?

फिमोसिस होने के कई कारणों को वजह माना गया है उसमें से प्रमुख है,

  • खराब स्वच्छता (Poor hygiene): अगर आप स्वच्छता का ख्याल नहीं रखते हैं तो यह फिमोसिस होने का एक मुख्य कारण बन सकता है।
  • एक्जिमा या सोरायसिस: अगर आपको एग्जिमा या सोरायसिस की समस्या है और यह समस्या आपके लिंग को प्रभावित करती है तो इस वजह से भी फाइमोसिस होने का खतरा देखा गया है।
  • चोट: चोट के कारण भी फाइमोसिस होने का खतरा देखा गया है अगर आपको कभी भी चोट लगा हो तो उस अवस्था में फिमोसिस होने का खतरा बढ़ जाता है।

फाइमोसिस में कौन-कौन से लक्षण देखे गए हैं?: Symptoms of Phimosis?

फिमोसिस में एक से अधिक लक्षणों को देखा गया है जिसमें से प्रमुख निम्नलिखित है।

  • सूजन 
  • लाली 
  • पेशाब करते समय दर्द 
  • तनाव में दर्द 
  • यौन क्रिया में दर्द 
  • पस आना

फाइमोसिस की होम्योपैथिक चिकित्सा और दवाइयां : Important Phimosis Homeopathic Medicine.

होम्योपैथिक दवाओं का प्रयोग लक्षणानुसार बेहतर माना जाता है। किसी भी होम्योपैथिक दवाओं का प्रयोग बीमारी के लक्षणों को देखकर चलाना बेहतर माना जाता है जिसके कारण उन बीमारियों को जल्द और बेहतर तरीके से ठीक कर पाना संभव हो सकता है फिमोसिस में इस्तेमाल की जाने वाली कुछ होम्योपैथिक दवाइयां निम्नलिखित है।

मार्क आयोड 2x,30 (Merc iod30) Phimosis Homeopathic Medicine: मुंडावरक (Phimosis) के पीछे न हटने की शिकायत में यह उत्तम औषधि मानी जाती है। इस दवा का इस्तेमाल सभी लोगों में किया जा सकता है।

खुराक: इस दवा की खुराक दिन में तीन बार (सुबह–दोपहर–शाम) तीन से पांच बूंद किया जा सकता है।

मर्क कोर 30 (Merc cor30) Phimosis Homeopathic Medicine: मुंडावरक के फट जाने में या औषधि उत्तम मानी जाती है।

खुराक: इस दवा की खुराक दिन में तीन बार (सुबह दोपहर शाम) तीन से पांच बूंदों तक लिया जा सकता है। इसका इस्तेमाल छोटे बच्चों से लेकर बड़े बुजुर्गों तक में उत्तम मानी जाती है।

रस टॉक्स 30 (Rus Tox 30) Phimosis Homeopathic Medicine: मुंडावरक के सूज कर लाल अथवा काले हो जाने तथा दर्द और जलन के लक्षणों में इसका प्रयोग उत्तम माना जाता है त्वचा के खुजलाने तथा उसने बस निकलने की अवस्था में यह औषधि लाभकर माना जाता है।

खुराक : इस औषधि की खुराक दिन में तीन बार सुबह दोपहर शाम 3 से 5 बूंदों की है।

मर्क सोल 30 (Merc Sol 30) Phimosis Homeopathic Medicine : मुंडा व्रत की सूजन के कारण उसे पीछे ना हटा पाना तथा पीछे हटाने के प्रयत्न करने पर उसने से नीला पीला पस निकलना। इन लक्षणों में इस औषधि का इस्तेमाल में लाभ मिलता है।

खुराक : इस औषधि की खुराक दिन में तीन बार सुबह दोपहर शाम 3 से 5 बूंदों की मानी जाती है।


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